आँखों मे सैलाब नजर आया है,

अनजान थी दुनिया जिस से अब तक,

आज वही राज सरेआम बिखर आया है, 

वो जो कभी जीने का मकसद था हमारा,

छोटे-छोटे टुकड़ो मे वो टूटा ख्वाब नजर आया है, 

कुछ यूँ घेरा है यादोँ के भँवर ने इसे, 

कि फिर “रवि ” की आँखों मे सैलाब नजर आया है,

सौ बार नमन है कम बेशक

है जिनकी देन से आज सवेरा, जो देके लबों पर गीत गये,
सौ बार नमन है कम बेशक, उनको जो आखिर जीत गये!

सीने पर गोली खाकर भी , जो बस  आगे ही बढ़ते रहे,
सांस ना छूट गई जब तक, वो  फिरंगियों से लड़ते रहे,
खूं मे लथपथ थे पर उनको, थोडी थकन ना आती थी,
पांव के छाले उनके लहु मे, जीत की अगन लगाती थी,
बंदूक की ठोकर सह-सह कर, कंधे जब जख्मी हो जाते,
बांध खपाच को कंधे पर, वो शूरवीर फिर डट जाते,
भेंट मे आजदी देकर जो , वो मांटी के पूत गये ,
सौ बार नमन है कम बेशक, उनको जो आखिर जीत गये!

जिस मां की  आंख के तारे थे, उन आंख मे आंसू छोड़ गये,
उस बूढे बाप की बैसाखी, माटी के लिये जो तोड़ गये,
ना सोचा राखी की ये कलाई, बहिना कहां से लायेगी,
सजनी का भी ना सोचा ,  किसे  विजय का तिलक लगायेगी,
आजादी के लिये छोड़कर , जो अपनो की प्रीत गये,
सौ बार नमन है कम बेशक, उनको जो आखिर जीत गये!

हे वीर तुम्हे ये पुष्प समर्पित ,” रवि” का तुम्हे सलाम मिले,
नायक हो बस तुम ही सच्चे , तुमको ये हमारा पयाम मिले,
वो तुम हो जो भारत मां से, देकर के प्रीत की रीत गये,
सौ बार नमन है कम बेशक, उनको जो आखिर जीत गये!

आवाज ए दिल ……..

ना गुनाह किया हैं ना जीने की सजा माँगता हूँ
आज तुझसे मेरे होने की वजह माँगता हूँ 
कल मिलाया था तो आज बिछड़ने का इशारा ना दे 
ऐ खुदा मैने कब कहा की उसके सिवा सारा जहां मांगता हूँ .

शहर-ए-लखनऊ

दोस्तों मैं अधिकतर शहरों में जा चुका हूँ। पर लखनऊ जैसा कोई नहीं, यहाँ की भाषा में जो मिठास और अदब है वो कहीं भी नहीं। बस यही कहूँगा कि इश्क हो गया है लखनऊ से।

बेशक तेरे साथ गुजारी हर शाम खूबसूरत है ,
तेरा साथ हो तो किसे जन्नत कि ज़रूरत है ,
अपनी चाहत सदा रहे  इसलिये ऐ #लखनऊ,
कुछ पल के लिये बिछड़ने की भी जरूरत है